हकीकत ए ईद ग़दीर

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*🥀 हकीकत ए ईद ग़दीर 🥀*



*नूर की सरकार से पाया दो शाला नूर का,*
*हो मुबारक तुमको ज़ुन्नुरैन जोड़ा नूर का*

✏️ बिरादराने अहले सुन्नत व अल जमाअत के सच्चे पक्के सुन्नी सही उल अकीदा भाइयों को फकीर डॉ तारीक़ हुसैन की जानिब से अस्सलाम ओ अलैकुम व रहमतुल्लाहि तआला व बरकाताहू। कल 18 ज़िल हिज्जा को हमारे मुआशरे में रवाफिज़ और कुछ जाहिल सुन्नी भी छुपे हुवे रवाफिज़ मुजावर, रवाफिज़ पीर, ढोंगी राफ़ज़ी बाबा, और जाहिल कव्वालों के साथ मिल कर 18 ज़िल हिज्जा को *ईद* की तरह मनाते हैं और इसको *ईद ए ग़दीर* के नाम से मनसूब करते हैं। जब उन सुन्नियो जो इसकी हकीकत से बे खबर है अपनी जहालत की बिना पर इसे मानाते है से पूछा जाए कि तुम इस दिन को ईद क्यों कहते हो??? तो वो या तो यूँ कहते है कि हमारे बाप दादा करते थे। या यूं कहेंगे कि फलाने बाबा या फलाने पीर या फलाने मुजावर ने कहा है या वो करते है इसलिए। इसकी हकीकत से अनजान लोग रवाफिज़ के इस अमल को करके खुद को साहाबी ए रसूल को लान तान करने वालो में शुमार कर रहे हैं। आईय्ये आज इस दिन और राफ़ज़ीयों के इस हरबे की हकीकत को आपके सामने पेश किया जाए।
      जब अहले तशईयों (राफ़ज़ी) से *ईद के ग़दीर* के मुताल्लिक़ सवाल किया जाता है तो वो धोका देने के लिए मन घड़ंत रिवायत बयान कर उसे यूँ बताते हैं कि हम हज़रत ए अली रदियल्लाहो अनहों को इमामत का खास मकाम और खिलाफत मिलने की खुशी में इसे मानाते हैं। लेकिन जब हम इनकी कुतुब खंगालते हैं तो हमे ग़दीर के मुताल्लिक़ ऐसी झूठी रिवायतें मिलती है जिसमे न सिर्फ साहाबा इकराम को मआज़ अल्लाह बदबख्त कहा गया बल्कि हुज़ूर अलैहिस्सलाम के वकार को कम कर उन्हें जिब्राइल अमीन से डांट का भी लिखा मिलता है। रिवायत कुछ यूं है-

*जब हुज़ूर अलैहिस्सलाम (हज के दौरान) मोकिफी में थे अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की तरफ से जिब्राइल ने आकर सलाम अर्ज़ किया। और कहा, आपकी मुद्दत ए हयात खत्म हो चुकी है। पस अली को बुलंद जगह खड़ा कर के लोगों से उनके हक में बैत लेलें। और वो वादा दोहराएं जो आपने लोगों से बैत लेने का मुझसे कर रखा है। क्योंकि में आपको दुनिया से उठा कर अपनी तरफ लाने वाला हूँ। हुज़ूर सलल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम को मुनाफ़ेकीन और दूसरे बदबख्त लोगों से ये खतरा हुवा के कहीं ये लोग फिर से जाहिलियत की तरफ न पलट जाएं। और तफरीक़ का शिकार न हो जाएं। क्योंकि आप उनकी अदावत से वाकिफ थे। और हज़रत ए अली रदियल्लाहो तआला अनहों से उनका बुग्ज़ व हसद बिल्कुल अयाँ था। आपने जिब्राइल से कहा, की अल्लाह तआला से मेरी हिफाज़त का सवाल करें। के वो लोगों से मेरी हिफाज़त व अस्मत का ज़िम्मा ले। हुज़ूर सलल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम अस्मत व हिफाज़त का हुक़्म आने के मुन्तज़िर थे। लेकिन मस्जिद ए खैफ तक जिब्राइल न आये। जब मस्जिद ए खैफ पहुंचे तब जिब्राइल आए। और वही वादा पूरा करने का हुक़्म दिया। और हज़रत ए अली को किसी ऊंचे मकाम पर खड़ा कर लोगों को उनसे हिदायत लेने का पैगाम सुनाए। लेकिन आपको अस्मत व हिफाज़त फिर न मिली। यहाँ तक के हुज़ूर सलल्लाहो अलैहि व सल्लम मक्का व मदीना के दरमियान "कुरा अल गमीमी" पहुंचे। वहां भी जिब्राइल वही साबेक़ा पैगाम ही लाए, हिफाज़त का कोई ज़िक्र न था। हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने फरमाया मुझे खदशा है कि हज़रत ए अली के मुताल्लिक़ जो बात तुमने पहुंचाई लोग उसे क़ुबूल न करेंगें और मुझे झुटलाएँगे। फिर जिब्राइल से इस्मत के बारे में पूछा इस मुआमले को फिर मुअखर कर दिया। हत्ता के आप खम्म ए ग़दीर तक पहुंचे। जो हज़फ़ फे तकरीबन तीन मील के फासले पर है। आपके पास जिब्राइल आये, आपको डाँट पिलाई। और लोगों से हिफाज़त का पैगाम भी लाए। कहा, ए मुहम्मद अल्लाह तआला सलाम के बाद कहता है "ए रसूल, जो कुछ आपकी तरफ उतारा है उसकी तब्लीग फरमा दीजिये" अगर आपने नहीँ किया तो समझना कि अल्लाह की रिसालत की तब्लीग ही आपने नहीं कि। और अल्लाह आपको हिफाज़त में ले रखेगा।*
*(एहतिजाज ए तिबरिसी, जिल्द अव्वल, सफा 69,70)*
*(जामे उल अखबार, सफा 11, फस्ल खामिस, फ़ज़ाईल ए अमीरुल मोमिनीन)*
*(तफसीरे ए साफी, जिल्द अव्वल, सफा 460)*

   देखें किस तरह एक मन घड़ंत रिवायत लिख कर हज़रात ए साहाबा को बदबख्त, और हुज़ूर अलैहिस्सलाम को अपनी जान का इस क़दर डर की अल्लाह का पैगाम पहुंचने में भी डरते रहे बताया जा रहा है। और हुज़ूर अलैहिस्सलातो व अस्सलाम को जिब्राइल अमीन के ज़रिए डाँटना डपटना बताया जा रहा है। क्या हुज़ूर अलैहिस्सलाम मआज़ अल्लाह इतने पास्त हिम्मत थे कि अपने साहाबा को अल्लाह का हुक्म बताने में अपनी जान व इज़्ज़त के लिए डरें?? मआज़ अल्लाह अपने जाली अकीदे और अदावत ए साहाबा को छुपाने के लिए ऐसी मन घड़ंत रिवायत बयान करना मुनाफिकों का ही काम हो सकता है। एक और रिवायत जो ईद ए ग़दीर के मुताल्लिक़ अहले तशई *(राफ़ज़ी)* बयान करते है मुलाहिज़ा हो:-

*किताब इस्लाहुर रसुम सफा 134 पर लिखा है कि "खुदा नें फरिश्तो को हुक्म दिया के ईद गदीर के इन तीन दिनो में शियाने अली के कोई गुनाह ना लिखा जाए - खवाह वोह कुछह भी करें"*

 खैर मेरा मकसद इस वक़्त मन घड़ंत रिवायतों की हकीकत ज़ाहिर करना नही। यहाँ बताना मक़सूद ये है कि अहले तशई के यहाँ हज़रत ए अली की मुहब्बत में किस कदर गुलू है कि हुज़ूर अलैहिस्सलाम की शान का भी ख्याल नही रखा गया। बहर हाल *मकाम ए ग़दीर* पर जो *रसूल ए आज़म सलल्लाहो तआला अलैहि व सल्लम* ने जो आखरी खुतबा दिया उस खुतबे में जो *रसूलुल्लह सलल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम* ने फरमाया *من کنتو مولا فعلی مولا* क़ोल को *हज़रत अली उल मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्ह* के लिए खिलाफत की दलील मानते है जबकि हरगिज़ *मौला* के माने खिलाफत के नही, न ही ईस क़ोल के माने मेरे बाद खलीफा अली होंगे के हैं। ये क़ोल *हज़रत अली रदियल्लाहो अन्ह* से *रसूलुल्लह सलल्लाहू तआला अलैहि व सल्लम* की क़राबत और हज़रत ए अली रदियल्लाहो अन्ह का मकाम और मर्तबा और आपकी मुहब्बत हुज़ूर की मुहब्बत और से अदावत हुज़ूर अलैहिस्सलाम से अदावत को ज़ाहिर करता है। काबिल ए गौर ये बात है कि क्या हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने ये खुतबा जो मकाम के ग़दीर पर दिया क्या इसमें में जिसका में मौला उसका अली मौला से मुराद खिलाफत के थे?? आईय्ये क़ुरआन मजीद से इसका जवाब दे

*فَاِنَّ اللّٰهَ هُوَ مَوْلٰىهُ وَ جِبْرِیْلُ وَ صَالِحُ الْمُؤْمِنِیْنَۚ-وَ الْمَلٰٓىٕكَةُ بَعْدَ ذٰلِكَ ظَهِیْرٌ(۴)*

*तो बेशक अल्लाह खुद उनका मदद ग़ार है, और जिब्राइल और नेक ईमान वाले और इसके बाद फरिश्ते मदद ग़ार हैं।*
*(सूरः तहरीम, आयत नंबर 4)*

   खम ए ग़दीर से पहले ही अल्लाह तआला ने *مولا* के माना बता दिए अगर अहले तशई की जानिब का अकीदा मान लिया जाए तो खुद रब्बे क़दीर ने जो पहले जिब्राइल अमीन फिर सालेह मोमिनीन और फिर तमाम फरिश्तो को *مولا* कहा तो सबके सब खलीफा ए अव्वल हो गए। गोया ये सिवा ए दीन का मज़ाक बना कर दीन ए इस्लाम को तोड़ने की कोशिश से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर हकीकत में 18 ज़िल हिज्जा को ईद की शक्ल में मनाने की वजह क्या है??? हज़रत ए अली रदियल्लाहो अनहों की फ़ज़ीलत का कोई ये पहला दिन तो था नही जो इसे ईद मान लिया जाए। जब हज़रत अली करमल्लाहु वजहुल करीम की विलादत हुई तब सब से पहले अपने दीदार ए मुस्तफा सलल्लाहो अलैहि व सल्लम किया क्या वो दिन फ़ज़ीलत ए अबू तुराब का नहीं??? जब हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने अबु तालिब से हज़रत ए अली रदियल्लाहो अन्ह को मंगा क्या वो दिन फ़ज़ीलत का नहीं??? जब अपनी लख्त ए जिगर को हज़रत ए अली को दियाक्या वो दिन फ़ज़ीलत का नहीं??? जब खैबर में झंडा हज़रत ए अली को दिया क्या वो दिन फ़ज़ीलत का नहीं?? जब ईसाइयों के मुतालबे पर हज़रत अली, फात्मतुज़्ज़हरा, हसनैन कारीमैन, को अपनी अहले बैत बताया, जब अपनी मुज़म्मिल में हज़रत ए अली, फात्मतुज़्ज़हरा, हसनैन करीमैन को लिया, क्या ये दिन हज़रत अली करम अल्लाहु वजहुल करीम की फ़ज़ीलत के न थे??? फिर क्यों 18 ज़िल हिज्जा को ईद के तौर पर मनाया जाता है जबकि इस दिन खुद रसूलुल्लह सलल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने अपनी इस दुनिया से रुखसती का इशारा अहले ईमान को दिया??? क्या वो दिन ईद का हो सकता है जिस दिन दोनों आलम की जान अपनी पर्दा पोषी का ऐलान करदे??? क्या वजह है जो इस दिन को ईद के तौर पर मनाया जाता है??? वजह एक दम साफ है।
    इस दिन को ईद अहले तशई इसलिए कहते हैं क्योंकि इसी दिन 18 ज़िल हिज्जा को *हज़रत उस्मान गनी* रदियल्लाहो अनहों को 40 दिन घर मे कैद कर, आप पर 40 दिनों तक खाना और पानी को बंद कर 18 ज़िल हिज्जा को क़ुरआन मजीद पड़ते हुवे ज़िबह किया गया। *ان للہ وانا الیہ راجعون* और तीन दिन तक आपके जिस्म मुबारक की तदफीन तक न होने दी। चूंकि अहले तशई उनसे जिन्हें हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने अपनी 2 बेटियाँ निकाह में एक के बाद दीगर दीं, से सख्त नफरत और उन्हें मआज़ अल्लाह काफिर तक कहते हैं, उनके ऊपर हुवे इस शब्बो सितम की खुशी मनाने के लिए ईद मानते हैं और हमारी जाहिल अवाम इन सुन्नियत के लबादे में छुपे रवाफिज़ो को अपनी जहालत की बिना पर भरोसा कर इस खुशी में शरीक हो जाती है। अल्लाह अल्लाह बताओ जिनके लिए हुज़ूर अपनी 2 बेटीया दे दें उनके इस क़द्र ज़ुल्म व सितम के साथ शहादत को ईद के तरह मनाना और उसे अहले बैत की तरफ मनसूब करना अहले बैत की मुहब्बत कैसे हो सकता है??? मेरे अज़ीज़ों इन यहूदियों के बनाये हुवे फिरके को पहचानो और खुद को और अपने अहलो अयाल को इनसे दूर रखो, अपनी नस्लो को इल्म और मुहिब्बे अहले बैत मुहिब्बे साहाबा से अरास्ता करो। अल्लाह तआला हमे रवाफिज़ के श्यार से महफूज़ ओ मामूर फरमाए। इस्लाम को सही तौर पर समझने और सही तौर पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। रवाफिज़ मुजावर, जाली पीर, जाली कव्वाल नकली बाबाओ के मक्र व फरेब से हमारी हिफाज़त फरमाए। आमीन सुम्मा आमीन।



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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*

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Usman E Gani ‎رضي الله عنه ‏Ke Gustako Ka Anjam ‎6⃣